जेएनयूएसयू के पूर्व संयुक्त सचिव और एबीवीपी नेता सौरव शर्मा के असिस्टेंट प्रोफेसर बनाए जाने को लेकर बवाल खड़ा हो गया है। बताया जा रहा है कि उनकी नियुक्ति स्कूल ऑफ कंप्यूटर एंड सिस्टम साइंस (SC&SS) में हुई है। जबकि स्क्रीनिंग कमिटी ने उन्हें इसके लिए शॉर्टलिस्ट नहीं किया था क्योंकि उनकी योग्यता मानकों पर खरी नहीं उतर रही थी। हालांकि बाद में उनका नाम इंटर्नल क्वालिटी एश्योरेंस (IQAC) सेल द्वारा शामिल किया गया था। जानकारी के मुताबिक असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर चयन की प्रक्रिया में तीन चरण हैं। स्क्रिनिंग कमिटी ,IQAC और अतंत: सिलेक्शन कमेटी। 25 नवंबर को तीन बाहरी विशेषज्ञों वाली सिलेक्शन कमिटी द्वारा उनकी नियुक्ति की गई। सिलेक्शन कमिटी में शामिल एक्सपर्ट्स को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं।
SC&SS के तत्काली प्रमुख डीके लोबियाल ने आरोप लगाया कि कॉलेज प्रशासन द्वारा दी गए फैक्लटी लिस्ट में इन तीनों एक्सपर्ट्स का नाम नहीं था। सौराष्ट्र विश्वविद्यालय से अतुल गोसाई, आई पी विश्वविद्यालय से अंजना गोसैन और पांडिचेरी विश्वविद्यालय से टी चित्रलेखा इन तीनों का नाम सिलेक्शन कमिटी में था जिसे लेकर सवाल उठाया गया है। इस मामले पर गोसाई और गोसैन ने टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। लोबियाल का कहना है कि जब नाम एकेडमिक काउंसिल के पास आया था तो उन्होंने नाम को लेकर विरोध जाहिर किया था। इससे पहले उनको पीएचडी की डिग्री दिए जाने को लेकर भी विवाद हुआ था।
आरोप था कि उन्हें जल्दी पीएचडी की डिग्री दे दी गई। जेएनयू के स्कूल ऑफ कंप्यूटेशनल एंड इंटीग्रेटिव साइंस में सौरभ शर्मा पढ़ते थे। सौरभ ने इसी साल 11 मार्च को अपना थीसिस जमा किया। 16 अप्रैल, 2019 को उनका वायवा हो गया। 3 मई को उन्हें प्रोविजनल डिग्री भी दे दी गई। सौरभ ओबीसी श्रेणी में शॉर्टलिस्ट किए गए थे। बता दें कि सौरभ शर्मा का नाम उन 14 लोगों में है जो 9 फरवरी 2016 को जेएनयू में हुई कथित देशविरोधी नारेबाजी में गवाह हैं।